कानपुर न्यूज डेस्क: कानपुर में 1991 में हुए कथित फर्जी पुलिस एनकाउंटर के मामले में करीब 35 साल बाद 12 रिटायर्ड पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। क्राइम ब्रांच-क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (सीबी-सीआईडी) की जांच में सामने आया कि पुलिस ने जिस मुठभेड़ का दावा किया था, वह कथित तौर पर फर्जी थी। जांच में यह भी पाया गया कि इस मामले में गिरफ्तार किए गए 12 लोगों के खिलाफ झूठे सबूत तैयार किए गए थे। मामले में कुल 18 पुलिसकर्मियों के नाम सामने आए थे, लेकिन इनमें से छह की मौत हो चुकी है।
शनिवार, 17 अक्टूबर को महाराजपुर थाने में सीबी-सीआईडी इंस्पेक्टर सुशील कुमार की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई। जांच में उस समय के थाना प्रभारी विद्यसागर त्रिपाठी और विवेचक रमेश चंद्र भटोले समेत 18 पुलिसकर्मियों को आरोपी बताया गया था। इनमें से छह की मौत होने के बाद अब 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। डीसीपी ईस्ट सत्यजीत गुप्ता ने एफआईआर दर्ज होने की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि सीबी-सीआईडी मामले की आगे जांच करेगी। हालांकि, अधिकारियों ने यह नहीं बताया कि एफआईआर दर्ज होने में इतने साल क्यों लग गए।
यह मामला 22-23 अगस्त 1991 की रात का है। उस समय महाराजपुर पुलिस ने दावा किया था कि उसने जीटी रोड पर नरवल क्रॉसिंग के पास लूट की कोशिश नाकाम की है। पुलिस के मुताबिक, बदमाशों ने सड़क पर पेड़ों की डालियां डालकर रास्ता रोक रखा था, ताकि वहां से गुजरने वाले वाहनों को रोककर लूटपाट की जा सके। इस मामले में राकेश पाठक समेत 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने उनके पास से अवैध हथियार, कारतूस और बम बरामद करने का दावा भी किया था।
बाद में राकेश के बड़े भाई देवी प्रसाद पाठक ने उत्तर प्रदेश सरकार से शिकायत की। उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन थाना प्रभारी को परिवार ने जमीन का एक प्लॉट मुफ्त में देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद उनके भाई और अन्य लोगों को झूठे मामले में फंसाया गया। सरकार ने 1991 में सीबी-सीआईडी जांच के आदेश दिए थे। उस समय इंस्पेक्टर आरपी सिंह ने मामले की जांच की और 25 सितंबर 1995 को लखनऊ स्थित सीबी-सीआईडी मुख्यालय ने अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी दी।
जांच के दौरान ट्रक चालक उमाशंकर पासी और क्लीनर बृजेंद्र सिंह ने पुलिस की कहानी को गलत बताया। दोनों के मुताबिक, वे कानपुर से वाराणसी साबुन लेकर जा रहे थे। 22 अगस्त की शाम रामादेवी चौराहे के पास एक पुलिसकर्मी उनके ट्रक पर चढ़ा और उसके बाद छह अन्य लोग भी वाहन में सवार हो गए। इसके बाद ट्रक को महाराजपुर थाने ले जाया गया। अदालत में सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज बयानों में दोनों ने कहा कि नरवल क्रॉसिंग पर किसी लुटेरे ने उनका रास्ता नहीं रोका था। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस थाने में दूसरे लोगों और हथियारों को लाया गया और उनसे दस्तावेजों पर बिना पढ़ने का मौका दिए हस्ताक्षर कराए गए।
सीबी-सीआईडी को दूसरे गवाहों से भी जानकारी मिली कि राकेश पाठक और कुछ अन्य आरोपियों को उनके घरों से सोते समय उठाया गया था। जांच में यह भी सामने आया कि बरामदगी के तौर पर दिखाए गए हथियारों में राकेश के पिता सदाशिव पाठक की लाइसेंसी दो नली बंदूक और देवी प्रसाद की लाइसेंसी राइफल शामिल थीं। जांच एजेंसी ने 18 पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया सबूत मिलने की बात कही और एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की।
मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं 194, 195, 182, 211, 218, 220, 323 और 342 के तहत केस दर्ज किया गया है। ये धाराएं झूठे सबूत तैयार करने, गलत जानकारी देने, झूठा आपराधिक आरोप लगाने, सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर, गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने और चोट पहुंचाने जैसे अपराधों से जुड़ी हैं।
जिन छह पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है, उनमें विद्यसागर त्रिपाठी, रामकांत, दुर्विन सिंह, राजन सिंह, उदय शंकर पांडे और महेंद्र सिंह शामिल हैं। वहीं, एफआईआर में नामजद बाकी 12 पुलिसकर्मियों में बीडी सारस्वत, योगेंद्र नाथ सिंह, हृदय नारायण तिवारी, तेज नारायण तिवारी, वैजनाथ, बृजेश कुमार सेवारत, चंद्रबली, विद्याकांत शुक्ला, रामाश्रय, रमेश कुमार तिवारी, जोगेश्वर यादव और रमेश चंद्र शामिल हैं।