कानपुर न्यूज डेस्क: कानपुर के चर्चित किडनी कांड का खुलासा एक महिला की शिकायत, खुफिया निगरानी और एक सतर्क आईपीएस अधिकारी की सूझबूझ से हुआ। छापेमारी के दौरान अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस और मेडिकल टीम को यह कहकर गुमराह करने की कोशिश की कि मरीज का गॉल ब्लैडर ऑपरेशन हुआ है। शुरुआती तौर पर टीम संतुष्ट होकर लौटने लगी, लेकिन प्रशिक्षु आईपीएस सुमेध जाधव को ऑपरेशन के निशान पर संदेह हुआ। उन्होंने पाया कि चीरे की जगह गॉल ब्लैडर से मेल नहीं खाती, जिससे अवैध किडनी ट्रांसप्लांट का शक गहराया और पूरा मामला खुल गया।
दरअसल, दिसंबर 2025 में कल्याणपुर क्षेत्र के अस्पतालों में संदिग्ध गतिविधियों की सूचना पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल को मिली थी, लेकिन उस समय ठोस साक्ष्य नहीं मिल पाए। फरवरी में एक महिला ने फोन कर बताया कि आरोही अस्पताल में रात के समय असामान्य हलचल और चीखने की आवाजें सुनाई देती हैं। इसके बाद खुफिया निगरानी बढ़ाई गई, जिससे 30 मार्च को किडनी खरीद-फरोख्त और अवैध ट्रांसप्लांट का नेटवर्क सामने आया।
जांच में पता चला कि बिना पंजीकरण के संचालित आरोही अस्पताल से जुड़े लोग केशवपुरम स्थित मेडलाइफ अस्पताल से भी जुड़े हैं। मोबाइल सर्विलांस के दौरान आहूजा अस्पताल का नाम सामने आया, जिसे सुरजीत आहूजा संचालित करते थे और उनकी पत्नी प्रीति आहूजा भी इसमें शामिल थीं। 29 मार्च को गुप्त सूचना मिली कि यहां दो किडनी ट्रांसप्लांट होने वाले हैं। पुलिस के पहुंचने तक एक ऑपरेशन हो चुका था, लेकिन सबूत के अभाव में तत्काल कार्रवाई नहीं हो सकी।
बाद में स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ दोबारा छापेमारी की गई। मरीज को गॉल ब्लैडर ऑपरेशन बताकर गुमराह करने की कोशिश हुई, लेकिन आईपीएस सुमेध जाधव की सतर्कता से सच्चाई सामने आ गई। मौके से डा. सुरजीत आहूजा, डा. प्रीति आहूजा और दलाल शिवम अग्रवाल को गिरफ्तार कर लिया गया। अब तक इस मामले में डॉक्टर दंपती समेत नौ लोग जेल भेजे जा चुके हैं, जबकि 11 अन्य संदिग्धों के नाम सामने आए हैं। कई शहरों के अस्पताल जांच के घेरे में हैं और मुख्य आरोपियों पर इनाम भी घोषित किया गया है।