कानपुर न्यूज डेस्क: कानपुर में सामने आए बहुचर्चित किडनी कांड ने पूरे मेडिकल सिस्टम की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच में डॉक्टरों, अस्पताल संचालकों, दलालों और ओटी स्टाफ की मिलीभगत का बड़ा नेटवर्क सामने आया है, जो कानपुर से लेकर लखनऊ, दिल्ली और गाजियाबाद तक फैला हुआ था। पुलिस अब तक 9 आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है, जबकि कई अन्य फरार हैं और उनकी तलाश जारी है।
इस गिरोह का मास्टरमाइंड गाजियाबाद निवासी डॉ. रोहित बताया जा रहा है, जो ट्रांसप्लांट की पूरी प्लानिंग करता था—किस अस्पताल में ऑपरेशन होगा और कौन सी टीम जाएगी, यह वही तय करता था। वहीं, मेरठ के डॉ. अफजाल अहमद और डॉ. वैभव मुद्गल जैसे लोग किडनी खरीदने-बेचने के लिए लोगों को जाल में फंसाते थे और ऑपरेशन टीम का हिस्सा भी बनते थे। जांच में सामने आया है कि इस अवैध कारोबार में करोड़ों रुपये का लेनदेन हुआ।
गिरोह में दलालों और अन्य सहयोगियों की भी अहम भूमिका थी। शिवम अग्रवाल जैसे लोग अस्पताल उपलब्ध कराते थे, जबकि अमित कुमार और अन्य आरोपी फर्जी जांच और भर्ती की व्यवस्था करते थे। कुछ अस्पताल संचालकों पर आरोप है कि उन्होंने पैसों के लालच में अपने ऑपरेशन थिएटर अवैध ट्रांसप्लांट के लिए उपलब्ध कराए। वहीं, ओटी मैनेजर और टेक्नीशियन भी इस नेटवर्क का हिस्सा बनकर हर केस के बदले मोटी रकम लेते थे।
इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब एक किडनी ट्रांसप्लांट के बाद पैसों को लेकर विवाद हुआ। जांच में सामने आया कि मरीज और डोनर को अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराया गया था। इसी कड़ी से पुलिस को सुराग मिला और पूरे रैकेट का पर्दाफाश हुआ। फिलहाल पुलिस फरार आरोपियों की तलाश में जुटी है और इस मामले में और बड़े खुलासों की उम्मीद जताई जा रही है।