कानपुर न्यूज डेस्क: कानपुर IIT में मच्छरों के दिमाग को समझने के लिए एक खास रिसर्च शुरू हुई है। वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि मच्छर इंसान की गंध को कैसे पहचानता है और अलग-अलग गंध के आधार पर किसी व्यक्ति की ओर जाने या उससे दूर रहने का फैसला कैसे करता है। इसके लिए मच्छर के ब्रेन में होने वाली न्यूरल एक्टिविटी को इलेक्ट्रोड की मदद से रिकॉर्ड किया जा रहा है। रिसर्च IIT कानपुर के डिपार्टमेंट ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज एंड बायोइंजीनियरिंग में प्रोफेसर नितिन गुप्ता की टीम कर रही है।
टीम एडीज एजिप्टी मच्छर पर अध्ययन कर रही है, जो डेंगू, चिकनगुनिया और जीका जैसी बीमारियों का प्रमुख वाहक है। मच्छर जब इंसान की गंध महसूस करता है तो गंध के अणु उसके एंटीना तक पहुंचते हैं और वहां से न्यूरॉन्स के जरिए ब्रेन तक संकेत जाते हैं। वैज्ञानिक अब यह समझना चाहते हैं कि ब्रेन इन संकेतों को कैसे प्रोसेस करता है और कौन से न्यूरॉन्स किसी गंध को आकर्षक या दूर भगाने वाली गंध के रूप में पहचानते हैं।
प्रोफेसर नितिन गुप्ता ने बताया कि अमेरिका में वह ग्रासहॉपर और लोकस्ट जैसे बड़े कीड़ों के ब्रेन पर काम कर चुके हैं। वहां उन्होंने इलेक्ट्रोड की मदद से कीड़ों के ब्रेन की गतिविधि रिकॉर्ड करने की तकनीक सीखी थी। 2014 में भारत लौटने के बाद उन्होंने इसी तकनीक को मच्छरों पर इस्तेमाल करने का फैसला किया। इसके बाद उनकी लैब में मच्छरों की कॉलोनी तैयार कर रिसर्च शुरू की गई। फिलहाल इसका मकसद कोई दवा बनाना नहीं, बल्कि मच्छर के व्यवहार और उसके ब्रेन की कार्यप्रणाली को समझना है।
इस रिसर्च से भविष्य में इंसानों के लिए ज्यादा सुरक्षित और असरदार मच्छर रिपेलेंट तैयार करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा ऐसे ट्रैप भी बनाए जा सकते हैं, जिनमें मच्छरों को आकर्षित करने वाली खास गंध या केमिकल हो और वे इंसानों की जगह ट्रैप की ओर जाएं। हालांकि इस बेसिक रिसर्च के व्यावहारिक इस्तेमाल में आने में 5 से 10 साल लग सकते हैं। फिलहाल वैज्ञानिकों का मुख्य सवाल यही है कि मच्छर इंसान की गंध को पहचानकर उसके करीब जाने या उससे दूर रहने का फैसला अपने ब्रेन में कैसे करता है।