कानपुर न्यूज डेस्क: आईआईटी कानपुर और गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी में सामने आया है कि डिप्रेशन के इलाज में एंटीडिप्रेसेंट दवा असर करेगी या नहीं, इसका अंदाजा इलाज शुरू होने के सिर्फ 7 से 10 दिनों के भीतर लगाया जा सकता है। रिसर्च में दिमाग और पेट से मिलने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल के साथ मरीजों के लक्षणों का विश्लेषण किया गया। यह अध्ययन Frontiers in Psychiatry जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
रिसर्च में 206 लोगों को शामिल किया गया, जिनमें डिप्रेशन से जूझ रहे 144 ऐसे मरीज थे, जिन्होंने पहले एंटीडिप्रेसेंट इलाज नहीं लिया था। वैज्ञानिकों ने EEG के जरिए दिमाग की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी और EGG के जरिए पेट की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी रिकॉर्ड की। इन सिग्नल्स को इलाज शुरू होने के समय और करीब एक हफ्ते बाद फिर से जांचा गया।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तरीके से उन मरीजों की पहचान जल्दी की जा सकती है, जिन पर एंटीडिप्रेसेंट दवा का असर होने की संभावना कम है। रिसर्च के दौरान बनाए गए मॉडल ने ऐसे मरीजों की पहचान करने में 84 फीसदी संवेदनशीलता और 78 फीसदी विशिष्टता दिखाई। अलग मरीजों के समूह पर टेस्ट करने पर मॉडल की कुल सटीकता 77.3 फीसदी रही।
शोधकर्ताओं का कहना है कि दिमाग और पेट से मिलने वाले संकेतों को मरीज के लक्षणों के साथ मिलाकर देखने से डिप्रेशन का इलाज ज्यादा व्यक्तिगत तरीके से तय करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस तरीके को बड़े और अलग-अलग तरह के मरीजों पर आगे भी जांचने की जरूरत है। अगर भविष्य की रिसर्च में इसके नतीजे सही साबित होते हैं, तो डॉक्टरों को 4 से 6 हफ्ते इंतजार किए बिना इलाज के शुरुआती दिनों में ही यह समझने में मदद मिल सकती है कि मरीज के लिए दवा बदलने या इलाज की रणनीति में बदलाव की जरूरत है या नहीं।