International Everest Day: इकलौता क्रिकेटर जिसने माउंट एवरेस्ट को किया फतेह, मर जाता अगर…

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Posted On:Friday, May 29, 2026

हर साल 29 मई को पूरी दुनिया में 'एवरेस्ट डे' (Everest Day) के तौर पर मनाया जाता है. दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) की ऊंचाई को नापने और उसे फतह करने का सपना हर पर्वतारोही का होता है. अब तक कई जांबाज इस चोटी पर तिरंगा और दुनिया के अलग-अलग देशों के झंडे फहरा चुके हैं. लेकिन, खेल जगत की बात करें तो क्रिकेट के इतिहास में ऐसा कारनामा करने वाले सिर्फ एक ही खिलाड़ी हैं. माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाले दुनिया के इकलौते क्रिकेटर एडम परोरे (Adam Parore) हैं.

न्यूजीलैंड के इस पूर्व दिग्गज विकेटकीपर बल्लेबाज ने साल 2002 में इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास ले लिया था. इसके ठीक 9 साल बाद, यानी साल 2011 में उन्होंने माउंट एवरेस्ट पर चढ़कर एक ऐसा इतिहास रच दिया, जिसे आज तक दुनिया का कोई दूसरा क्रिकेटर नहीं दोहरा पाया है.

जान की बाजी लगाकर नापी 8,848 मीटर की ऊंचाई

समुद्र तल से माउंट एवरेस्ट की कुल ऊंचाई 8,848 मीटर है. इस दुर्गम और बर्फीली चोटी को फतह करने के प्रयास में जहां कई लोगों को सफलता मिली है, वहीं कई पर्वतारोहियों को अपनी जान से हाथ भी धोना पड़ा है. एडम परोरे ने भी साल 2011 में अपनी जान की बाजी लगाकर इस बेहद खतरनाक मिशन को पूरा किया था और क्रिकेट जगत के साथ-साथ पर्वतारोहण की दुनिया में भी अपना नाम अमर कर लिया.


चढ़ाई करने से 2 महीने पहले ही नेपाल क्यों पहुंचे थे परोरे?

न्यूजीलैंड के इस पूर्व क्रिकेटर ने इतनी कठिन चढ़ाई में कैसे सफलता हासिल की, इसका दिलचस्प खुलासा उन्होंने इस ऐतिहासिक कारनामे को अंजाम देने के बाद मीडिया से बातचीत में किया था:

  • तैयारी और ट्रेनिंग: एडम परोरे ने बताया कि हालांकि उन्होंने अपनी अंतिम चढ़ाई मई 2011 में पूरी की थी, लेकिन इसकी पुख्ता तैयारी के लिए वह 27 मार्च 2011 को ही नेपाल पहुंच गए थे.

  • मौसम के अनुकूल खुद को ढालना (Acclimatization): नेपाल पहुंचने के बाद उन्होंने प्रसिद्ध 'हिमालय एक्सपीरियंस' कंपनी के साथ कड़ा अभ्यास और ट्रेनिंग शुरू की. मुख्य चढ़ाई शुरू करने से पहले लगभग दो महीने तक उन्होंने बेस कैंप और उसके आसपास रहकर अपने शरीर को वहां के जानलेवा मौसम, हाड़ कंपाने वाली ठंड और कम ऑक्सीजन के स्तर में ढालने (Acclimatize) का काम किया.

उनकी इसी कड़ी मेहनत और अनुशासन का नतीजा था कि वे बिना किसी बड़ी दुर्घटना के दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के शीर्ष पर पहुंचने में कामयाब रहे. क्रिकेट के मैदान पर विकेट के पीछे अपनी मुस्तैदी के लिए जाने जाने वाले परोरे ने साबित कर दिया कि अगर हौसला बुलंद हो, तो इंसान किसी भी ऊंचे मुकाम को हासिल कर सकता है.


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