कानपुर न्यूज डेस्क: नगर निगम के अफसरों की लापरवाही और मिलीभगत का बड़ा मामला सामने आया है। रिश्वतखोरी में गिरफ्तार बाबू और जांच में फंसे चपरासी को बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे ही स्थायी कर दिया गया। इतना ही नहीं, बाबू राजेश यादव की दोबारा ज्वाइनिंग भी करवा दी गई। जब स्थायीकरण की सूची जारी हुई, तो यह खुलासा होते ही हड़कंप मच गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए नगर आयुक्त ने तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए और दोनों के नाम सूची से हटाने के आदेश दिए। साथ ही, संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया गया है।
यह मामला तब शुरू हुआ जब सतर्कता विभाग ने 24 अगस्त को नगर निगम के बाबू राजेश यादव को घूस लेते रंगे हाथों पकड़ा था। पूछताछ में उसने कई अधिकारियों और बाबुओं के नाम बताए, जिससे भ्रष्टाचार के बड़े नेटवर्क का अंदाजा लगाया गया। नगर आयुक्त ने मामले की जांच अपर नगर आयुक्त तृतीय अमित कुमार भारतीय को सौंपी थी, लेकिन उनके तबादले के बाद जांच ठप हो गई। अफसरों ने किसी अन्य अधिकारी को जांच की जिम्मेदारी नहीं दी, और इस दौरान राजेश यादव ने छह मार्च को नगर निगम में फिर से पदभार ग्रहण कर लिया। इसी बीच 12 मार्च को 223 कर्मचारियों के स्थायीकरण की सूची जारी हुई, जिसमें घूसखोर बाबू और जांच में फंसे चपरासी का भी नाम शामिल था।
आश्चर्यजनक रूप से, इस सूची में पहले से स्थायी हो चुके पांच अन्य कर्मचारियों के नाम भी दोबारा डाले गए और नगर आयुक्त से अनुमोदन करा लिया गया। राजेश शुक्ला, जिन पर नशे में धुत्त होकर जोनल अधिकारी से बदसलूकी करने का आरोप है, उनका नाम भी इस सूची में था। नगर निगम के कार्मिक विभाग की इस गड़बड़ी पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बिना जांच पूरी हुए इन कर्मचारियों को स्थायी करने की अनुमति कैसे दी गई। अब इस पूरे मामले की जांच होगी और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।